Rajasthan GK- Rajasthan sthapatya kala राजस्थान में स्थापत्य कला

Rajasthan GK- Rajasthan sthapatya kala राजस्थान में स्थापत्य कला राजस्थान स्थापत्य कला का भी धनी है। यहाँ का नगर निर्माण ,भवन निर्माण ,दुर्गो का निर्माण , हवेलियों का स्थापत्य तथा मंदिरो का स्थापत्य बेजोड़ है। आज हम आपको राजस्थान में स्थापत्य कला , नगर नियोजन एवं शिल्प , राजस्थान की स्थापत्य कला की प्रमुख विशेषता , किले एवं दुर्ग , राजस्थान के स्मारक , राजस्थान की हवेलिया , राजस्थान की मंदिर शिल्प आदि के बारे में संक्षिप्त जानकारी देंगे।
राजस्थान में स्थापत्य कला , नगर नियोजन एवं शिल्प , राजस्थान की स्थापत्य कला की प्रमुख विशेषता , किले एवं दुर्ग , राजस्थान के स्मारक , राजस्थान की हवेलिया , राजस्थान की मंदिर शिल्प,Rajasthan GK- Rajasthan sthapatya kala,rajasthan gk, rajasthan history , rajasthan kala & sanskriti
Rajasthan GK- Rajasthan sthapatya kala राजस्थान में स्थापत्य कला 

Rajasthan GK

 Rajasthan sthapatya kala राजस्थान में स्थापत्य कला 

राजस्थान स्थापत्य कला का भी धनी है। यहाँ का नगर निर्माण ,भवन निर्माण ,दुर्गो का निर्माण , हवेलियों का स्थापत्य तथा मंदिरो का स्थापत्य बेजोड़ है। राजस्थान  स्थापत्य कला को इन शीर्षकों के अंतर्गत जाना जा सकता है-
  1. नगर नियोजन एवं शिल्प 
  2. भवन शिल्प 
  3. दुर्ग शिल्प 
  4. मंदिर शिल्प 

नगर नियोजन एवं शिल्प 

मानव की विकास यात्रा के सभ्यता रूपी सोपानों में नगर नियोजन का महत्पूर्ण स्थान है।  सुविधानुसार रहने के लिए नगर नियोजन की लम्बी यात्रा में राजस्थान के हमारे पूर्वज भी पीछे नहीं रहे।  
गणेश्वर , कालीबंगा , आहड़ ,नोह आदि की संस्कृतियों से यह स्पष्ट हो गया है की मोहनजोदड़ो ,हड़प्पा तथा सिंधु घाटी सभ्यता की भांति यहाँ  नदियों के किनारे मानव नगर नियोजन करने लगा था। 
गंगानगर जिले में कालीबंगा तथा सौंथी में हुई खुदाई से ऐसे अनेक प्रमाण मिले है , जिनसे जानकारी मिलती है कि ऋग्वेद काल से पूर्व कई शताब्दियों पहले सरस्वती तथा दृषद्वती नदियों के काठो में उपजाऊ भूमि होने के कारण नगर नियोजन तथा भवन निर्माण उच्च कोटि का था। ईटों से बने हुआ भवन ,सड़के , नालियाँ ,गोल,कुए , वेदियाँ आदि इस बात की प्रमाण है की अब विलुप्त प्रायः सरस्वती नदी के किनारे स्थित उस समय की संस्कृति बेजोड़ थी।  
कालीबंगा तथा सौंथी की भांति दक्षिणी-पश्चिमी राजस्थान में आहड़ ,गिलूण्ड आदि संस्कृति के प्रसिद्ध केंद्र रहे थे।  इन स्थानों पर खुदाई से ज्ञात हुआ है कि यहाँ पत्थरो तथा पकाई हुई ईटो से सुदृढ़ मकान बनाये जाते थे। इन मकानों में खिड़कियॉ , आँगन आदि का बनाना आवास के उतम उदाहरण थे।  इन मकानों में पानी निकालने की नालियाँ ,गलियाँ ,सड़के उस समय की नगर नियोजन की समृद्ध परम्परा को अभिव्यक्त करती है।  नोह् के टीले की खुदाई से भवन निर्माण की समृद्ध परम्परा की जानकारी मिली है।  
पौराणिक सभ्यता के तो राजस्थान में ऐसे अनेक केंद्र है।  जहाँ बड़े-बड़े नगरों के निर्माण की कहानी उपलब्ध है।  महाभारत में विराटनगर (बैराठ),मत्स्यपूरी ,माचेड़ी ,पुष्कर आदि नगरों का वर्णन मिलता है जो स्थापत्य तथा सुरक्षा की दृष्टि से सुंदर व नगर विन्यास एवं नगर नियोजन के लिए विख्यात थे।
मौर्यकाल में बेड़च नदी के किनारे मध्यमिका (चितौड़ के पास जिसे आजकल नगरी कहते है) का सुंदर नगर विन्यास इस बात का प्रमाण है की तृतीय ईसा पूर्व से छठी शताब्दी तक यह एक प्रसिद्ध एवं समृद्धशाली नगर रहा था।  इसी प्रकार गुप्त तथा गुप्तोत्तर काल में मेनाल ,अछनेरा ,आभानेरी ,डबोक एवं भरतपुर के आस-पास का क्षेत्र नगरीय सुंदरता के नमूने थे।  इन स्थानों का समन्वयात्मक निर्माण इन स्थानों पर दृष्टिगत खंडहरो में देखा जा सकता है।
सातवीं से तेरहवी शताब्दी तक का समय राजस्थान में स्थापत्य की दृष्टि से विशेष महत्वपूर्ण है।  राजपूत काल में जहाँ-जहाँ राजपूत राजाओ की राजधानिया बनी ,वहाँ नगर नियोजन तथा नगर विन्यास की भूमिका महत्वपूर्ण रही। भीनमाल , चितौड़ ,मंडोर ,ओसियां ,रणथम्भौर ,झालरापाटन ,व्याघ्रराज (राजगढ़), राजोरगढ़ , आमेर आदि सुरक्षा की दृष्टि से तथा जोधपुर , जैसलमेर , बीकानेर ,उदयपुर ,बूंदी ,कोटा,जयपुर  जैसे नगरों की स्थापना राजधानी के लिए की गई।  ये सभी नगर-नियोजन  अनुपम उदाहरण है।
राजस्थान में प्राचीन समय से ही नगर-नियोजन में वृत्त एवं वर्ग का महत्वपूर्ण स्थान रहा है।  हिन्दू शिल्प ज्योतिष तथा वास्तुशास्त्र पर आधारित रहा है। वास्तुशास्त्र के अनुसार दस लाइन पूर्व से पश्चिम की और तथा दस लाइन उत्तर से दक्षिण की और खींची जाती है , जिससे एक वर्गाकार आकृति बनती है।  जयपुर के नगर नियोजन में इस समय के चीनी नगरों में केटिया के नगरों एवं बगदाद की तरह "वृताकार परिमितियाँ एवं वर्गाकार "इन दो महान सिद्धांतो का पालन किया गया।

भवन शिल्प

नगर नियोजन के साथ-साथ निर्माण में भवन शिल्प का भी प्राचीन काल से ही महत्वपूर्ण स्थान रहा है। यहाँ के राज प्रासादों , हवेलियों ,छतरियों ,मकबरों , मस्जिदों दरगाहो आदि का भवनशिल्प देखते ही बनता है।
(क) राज प्रसाद - हमें प्राचीन ग्रंथो में राज प्रासादों का विस्तार से वर्णन मिलता है। यहाँ नगर विन्यास रक्षा की दृष्टि से , पहाड़ो से घिरे हुए विस्तृत स्थान पर होता आया है या नदियों के किनारो  पर ऐसे स्थान पर जहाँ पानी से राज प्रासादों की रक्षा रहती है।
ऐसे नगरों में राज प्रसाद या राजमहल या तो ऊंचे स्थान पर एक कोने में या फिर नगर के बीच में बनाये गए है। राजस्थान में विराटनगर ,मैनाल ,नागदा ,राजौरगढ़ ,नगरी आदि प्राचीन नगर इस दृष्टि से महत्वपूर्ण माने गए है किन्तु इन नगरों में आज राज प्रासादों के प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
राजस्थान में राजपूत राजाओ ने राज कायम करने के साथ ही रक्षा की दृष्टि से किले का निर्माण एवं किले में ,या फिर किले के नीचे ही रहने लिए भव्य राज प्रसाद बनवाये,जिनमे मुग़ल तथा राजपूत शैली की वास्तुकला का सूंदर समन्वय है।  मर्दाना तथा जनाना महल एक दूसरे से सटे हुए भी व्यवस्था की दृष्टि से अलग-अलग बनाये गए।
मुग़ल स्थापत्य के प्रभाव से पहले के राज प्रासाद जहाँ सादा , छोटे-छोटे कमरों वाले तथा राजपूत स्थापत्य के मौलिक प्रतिक है वही राजपूत-मुग़ल सम्बन्धो के कारण राज प्रासादों के निर्माण  भारी फेरबदल हुआ है।
फव्वारों तथा जलाशयों से युक्त बैग-बगीचे,कुंज-निकुंजों से घिरे राजमहल ,उपयोग  दृष्टि से दीवाने खास , दीवाने आम, शयन कक्ष ,तोपखाना ,गवाक्ष ,जाली-झरोखे ,रंगमहल आदि कला के उत्कृष्ट नमूने है
राजस्थान के राज प्रासाद आज कला के उत्कृष्ट एवं बेजोड़ नमूने है। इनका संरक्षण आवश्यक है।  उदयपुर ,जोधपुर के महल ,बीकानेर का लालगढ़ पैलेस , जयपुर का सिटी पैलेस ,अलवर के महल ,कोटा का राजमहल , बूंदी का महल एवं चित्रशाला , जैसलमेर के महल ,करोली  राजमहल आदि राज प्रासादों  परम्परा में राजस्थान के बेजोड़ नमूने है। इनकी स्थापत्य कला अभूतपूर्व है।

(ख) हवेलियाँ- प्राचीन हवेलियों के निर्माण की स्थापत्य कला की भारतीय वास्तु कला के अनुसार रही है। हवेली की लम्बाई , चौड़ाई तथा कमरों के निर्माण की एक परम्परा रही है , जिसको राजस्थान के गाँवो में वास्तुकार आज भी अपनाते है।  मुख्य द्वार के दाये-बाये कलात्मक गवाक्ष , द्वार के बाद लम्बी पोल , उसके बाद बड़ा चौक एवं चौक में दाये-बायें के कमरे ,सामने चौबारा तथा चौबारे के दायें-बायें तथा पीछे कमरे। बड़ी हवेली  में दो-तीन चौक तथा कई मंजिलें भी हो सकती है।
जयपुर की हवेलियों की परम्परा इतनी प्रसिद्ध हुई कि बाद में शेखावाटी  के सेठो ने अपने-अपने गांवो में विशाल , हवेलियाँ बनवाने की परम्परा ही डाल दी। नवलगढ़ ,फतेहपुर, मुकुन्दगढ़ , पिलानी ,मंडावर ,रतनगढ़ ,सरदार शहर आदि कस्बो में विशाल हवेलियाँ हवेली-शैली स्थापत्य  उत्कृष्ट उदाहरण है।
जैसलमेर  सालमसिंह की हवेली,नथमल की हवेली तथा पटवों की हवेली तो पत्थर की कटाई तथा जाली-झरोखों  के कारण आज संसार में प्रसिद्ध हो चुकी है।  पत्थर  की बनी हुई करौली , भरतपुर ,कोटा की हवेलियों भी अपनी कलात्मक संगतराशि के कारण बेजोड़ मानी जाती है।
हवेलियों के कारण आज हवेली शैली का स्थापत्य ,हवेली संगीत ,हवेली चित्रकला आदि सांस्कृतिक क्षेत्र में प्रसिद्ध हो चुके है।

(ग) छतरियां- राजस्थान में राजाओ के मरणोपरांत उनकी याद में स्थापत्य की दृष्टि  विशिष्ट स्मारक बनाये गये ,जिन्हे छतरियाँ तथा देवल के नाम से जाना जाता है।  स्थापत्य कला तथा भवन निर्माण दृष्टि  से इन स्मारकों बहुत महत्व है।  राजाओं ,सेठों , संतों , महापुरुषों की शमशान भूमि राजस्थान में ऐसे स्मारकों से भरी पड़ी है।
जयपुर  का गैटोर , जोधपुर का जसवंत थड़ा ,कोटा का छत्र विलास बाग , जैसलमेर का बड़ा बाग तो इस दृष्टि से बहुत  महत्वपूर्ण है।  राजस्थान का ऐसा कोई प्राचीन नगर नहीं जहाँ श्मशानों में छतरियाँ न बनी हो। संगमरमर के पत्थर  लेकर वंशी पत्थर तथा जैसलमेर के पीले पत्थर पर बनी ये छतरियाँ मुग़ल तथा राजपूत कला का सूंदर समन्वय प्रस्तुत करती है।
अनेक स्तम्भों पर टिके गोल गुंबद वाली राजपूती मेहराबदार छतरियाँ मूर्तिकला तथा बेलबूटों  सुसज्जित स्थापत्य सूंदर नमूने  कारण देखते ही बनती है।
अलवर में मुंसी महारानी  की छतरी ,फतेह गुम्बद ,करोली में गोपाल सिंह की छतरी ,बूंदी में चौरासी खम्भों की छतरी ,रामगढ़ में सेठो की छतरी ,बीकानेर में राव कल्याण मल की छतरी , गैटोर (जयपुर ) में ईश्वर सिंह की छतरी ,जोधपुर में जसवंत सिंह का थड़ा ,जैसलमेर  में राजाओ तथा पालीवालों की छतरियों का स्थापत्य-सौंदर्य देखने योग्य है।
राजाओ  की छतरियों में अधिकतर पगले (पैर) बने हुए है ,वही शैवों ,नाथो की छतरियों में खड़ाऊ ,शिवलिंग या नदी प्रतीक के रूप में बने हुए है। इस दृष्टि से जोधपुर के महामंदिर की छतरी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

(घ) मकबरे,मस्जिद एवं दरगाह - राजस्थान समन्वयात्मक संस्कृति का क्षेत्र रहा है। यहाँ मंदिरों की तरह अनेक मस्जिदें , गिरजाघर , गुरुद्वारे ,मकबरे ,दरगाह आदि समय-समय पर बनते रहे है। इस संदर्भ में अजमेर की ख्वाजा मोहिनुद्दीन चिश्ती  की दरगाह का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है।

दुर्ग शिल्प 

राजस्थान गढ़ो एवं दुर्गो का प्रदेश है। दुर्ग निर्माण की परम्परा यहाँ प्राचीन काल से ही है। शुक्रनीति के अनुसार के अनुसार राज्य के सात अंग माने गये है। उनमे से दुर्ग भी एक है। राज्य के सात अंग निम्न है-(1)  स्वामी (राजा)                   (2) अमात्य (मंत्री)                             (3) सुहत           (4) कोष                      (5) राष्ट्र                (6) दुर्ग                      (7) सेना  

अन्य आचार्यो  ने भी दुर्ग को महत्वपूर्ण माना है। कौटिल्य  का कहना है कि राजा को अपने शत्रुओ से सुरक्षा के लिए राज्य की सीमाओं पर दुर्गो का निर्माण करवाना चाहिए। उन्होंने दुर्गो को चार प्रमुख कोटियों में रखा है - (1) औदेक दुर्ग (जल दुर्ग ) , (2) पार्वत दुर्ग (पर्वत दुर्ग) ,  (3) धान्वन दुर्ग (मरुस्थल दुर्ग)  ,  (4) वन दुर्ग  ।
याज्ञवल्क्य स्मृति तथा मनुस्मृति मे सुरक्षा की दृष्टि से दुर्गों का बहुत महत्व बताया गया है । दुर्ग निर्माण मे राजस्थान की स्थापत्य कला का चरम उत्कर्ष देखा जा सकता है । प्राचीन ग्रंथों मे दुर्गों की जिन प्रमुख विशेषताओ का उल्लेख है वे यहा के दुर्गों मे प्रायः पाई जाती है ।
सुदृढ़ प्राचीन , विशाल परकोटा , अभेद्य बुर्जे ,दुर्ग के चारो ओर नहर , दुर्ग के अंदर शस्त्रागार ,पानी के टाँके , अन्न भंडार , दुर्ग का गुप्त प्रवेश द्वार तथा सुरंग राज प्रासाद तथा सैनिको के आवास गृह यहाँ के करीब-करीब सभी दुर्गो में पाए जाते है।
चितौड़ का दुर्ग , गिरी दुर्गो में सबसे प्रमुख तथा सबसे प्राचीन है।  चितौड़ का दुर्ग जहाँ इतिहास के तीन प्रसिद्ध साके हुए , सब किलो का सिरमौर है।  इस दुर्ग के लिए यह उक्ति है -"गढ़ तो चितोडगढ ,बाकी सब गढ़ैया। "
वीर क्षत्रियो के बलिदान तथा राजपूत ललनाओं के जौहर के साक्षी चितौड़ दुर्ग की विशेषता है , उनकी घुमावदार प्राचीरें , उन्नत तथा विशाल बुर्जे , विशाल पर्वत की घाटी के कारण संकरा मार्ग, जिसने सामरिक दृष्टि से इस किले को अजेय बना दिया है।
कुम्भलगढ़ दुर्ग भी एक विशाल तथा ऊंची पहाड़ी पर बना हुआ है। इसके सुदृढ़ द्वार है तथा यह प्राचीरयुक्त भी है।  इस दुर्ग की विशेषता है इसके भीतर स्थित लघु दुर्ग-कटारगढ़।  इस किले की  ऊचाई के बारे में अबुल फजल ने लिखा है की यह इतनी बुलंदी  पर बना हुआ है की नीचे से ऊपर की तरफ देखने पर सिर की पगडी गिर जाती है।  राजस्थान के गिरि दुर्गो में प्रमुख एक और दुर्ग रणथम्भोर का दुर्ग भी है।  इस दुर्ग के स्थापत्य की विशेषता यह है की एक उत्तुंग तथा विशाल पर्वत शिखर पर स्थित होने पर भी यह दुर्ग दूर से दिखाई नहीं पड़ता , जबकि इसके ऊपर से शत्रु की सेना सरलता से  सकती है। 
गिरि दुर्गो में सिवाना का दुर्ग , जालौर का दुर्ग ,अजमेर का तारागढ़ दुर्ग , जोधपुर का मेहरानगढ़ दुर्ग ,आमेर - जयपुर का जयगढ़ दुर्ग ,दौसा का दुर्ग तथा कुचामन का दुर्ग भी स्थापत्य की दृष्टि से अच्छे गिरि दुर्ग है।  इन प्रमुख गिरि दुर्गो के अतिरिक्त राजस्थान के जल दुर्गो की श्रेणी में गागरोन का दुर्ग प्रसिद्ध है।  यह दुर्ग झालावाड़ के पास आहु व कालीसिंध नदियों के संगम पर स्थित  है।  यह दुर्ग 1480 में वीर अचलदास खींची के शासनकाल में हुए साके के कारण प्रसिद्ध है। 
राजस्थान में स्थल दुर्ग अनेक है।  जैसलमेर का दुर्ग पीले पत्थरो से निर्मित एक विशाल तथा सुदृढ दुर्ग है।  यह सिर्फ पत्थरो को जोड़कर बनाया गया है ,जिसमें कहीं पर भी चूने का काम नहीं है।  इसे धान्वन दुर्ग की कोटि में रख सकते है क्योंकि यह चारो और मरुस्थल से घिरा हुआ है।  इस दुर्ग के बारे में यह दोहा प्रसिद्ध है - गढ़ दिल्ली ,गढ़ आगरो ,अधगढ बीकानेर। भली चिणायो भाटियां ,सिरे तो जैसलमेर।
बीकानेर का जूनागढ़ दुर्ग तथा नागौर का दुर्ग सुदृढ़ स्थल दुर्गो में गिने जाते है। सामंती दुर्गो में चौमूँ का दुर्ग भी स्थल दुर्ग का अच्छा उदाहरण है।  वस्तुतः राजस्थान का दुर्ग-स्थापत्य बहुत ही समृद्ध तथा उन्नत है। 

मंदिर शिल्प


राजस्थान में मंदिर निर्माण का विशेष महत्त्व रहा है , इसलिए इस शीर्षक के अंतर्गत मंदिर शिल्प की , उसे भवन शिल्प से अलग रखकर जानकारी दी जा रही है।  गुप्तकाल की समाप्ति से लेकर पंद्रहवी शताब्दी तक राजस्थान उत्तर भारतीय मंदिर निर्माण तथा मूर्ति निर्माण कला का एक प्रमुख केंद्र रहा है।  उत्तर भारत में मंदिर निर्माण का जो चरमोत्कर्ष दिखाई देता है , उसके पीछे राजस्थान के मंदिर निर्माण की उन्नत परम्परा रही है। 
राजस्थान में सबसे पहला समयांकित मंदिर झालरापाटन में शीतलेश्वर महादेव का मंदिर है।  इसका मूल भाग 689 में बना।  सातवीं शताब्दी के अंत का यह मंदिर दक्षिण में होने से मालवा की मंदिर निर्माण परम्परा में आता है।  राजस्थान में व्यापक मंदिर निर्माण परम्परा के अध्ययन हेतु मरू प्रदेश का अध्ययन भी अभीष्ट है।  
सांस्कृतिक वैभव में गुर्जर प्रतिहारो का महत्वपूर्ण स्थान है।  प्रतिहार वंश का संस्थापक भट्टारक हरिशचंद्र छठी शताब्दी में मांडव्यपुर (मण्डौर ,जोधपुर) का राजा हुआ।  इसके पश्चात् मण्डौर ,मेड़ता तथा जालौर में राज्य करने वाले गुर्जर प्रतिहारो के साथ जुड़े इस कला आंदोलन को महामारू शैली कहा गया ,जिसका विस्तार मरुप्रदेश के अलावा मत्स्य प्रदेश में बांदीकुई के पास आभानेरी तथा दूसरी और चितौड़ ,बड़ौली बलि उत्तरी मेदपाट तथा ऊपरमाल पट्टी तक हुआ।  
आठवीं से लेकर दसवीं शताब्दी  तक इस शैली ने जैन तथा हिन्दू परम्पराओ में सैकड़ो मंदिरो को जन्म दिया।  इन मंदिरो में धार्मिक सहिष्णुता देखते ही बनती है। शैव ,वैष्णव ,जैन ,शाक्त सभी का समन्वय  स्थान पर मिलना आश्चर्यजनक है।  
महामारू शैली के प्रारम्भिक उत्कर्ष काल में चितौड़, औसियां तथा आभानेरी पर हमारा ध्यान केंद्रित होता है।  प्राचीनकाल से ही चितौड़ राजनीति के साथ ही कला तथा संस्कृति का भी गढ़ रहा।  गुहिल वंश से पूर्व तथा महाराणा कुम्भा तक यहाँ वास्तुकला का मंदिर निर्माण में बेजोड़ योगदान रहा।  कालिका माता तथा कुम्भ स्वामी के मंदिर बप्पा रावल  पहले के (सातवीं शताब्दी के) है।  
बारहवीं शताब्दी में बने चितौड़ के समृद्धेश्वर मंदिर पर सोलंकियो के संरक्षण  कला का प्रभाव स्पष्ट रूप से नजर आता है।  महाराणा कुम्भा तो विशेष कला पारखी थे।  उनके समय का वास्तुकार मंडन मेवाड़  इतिहास में विशेष प्रसिद्ध रहा है।  उनके देवता मूर्ति प्रकरण ,राजा वल्ल्भ मण्डन ,प्रासाद मंडन तथा रूप मंडन वास्तुकला प्रसिद्ध ग्रन्थ। है  विजय स्तम्भ का निर्माण इन ग्रंथो के आधार पर ही हुआ है।  इस दृष्टि से महाराणा कुम्भा का काल स्थापत्य कला का स्वर्ण युग माना जाता है।  
गुर्जर प्रतिहार कला का विस्तृत तथा उत्कृष्ट उदाहरण औसियां में मिलता है। धार्मिक सहिष्णुता, विशाल तथा पैनी दृष्टि ,आठवीं से दसवीं शताब्दी तक कला का उत्कर्ष , महामारू सैली की विशिष्टताएँ ,लोक कलात्मक सहजता तथा सरलता  के साथ ही भावनुकूल अलंकरण औसियाँ के मंदिरो में देखा जा सकता है। 
औसियाँ के पुराने मंदिर- सचिया माता का पुराना सूर्य मंदिर ,महावीर मंदिर , तीनो हरिहर मंदिर , पीपलडा माता का मंदिर 750 से 825 तक के बने हुए है।  वैष्णव धर्म ,शैव धर्म ,जैन धर्म एवं शाक्त धर्म का एक स्थान पर ही इतना सहिष्णु एकीकरण अन्य स्थान पर मिलना दुर्लभ है। इसी प्रकार से बौद्ध कला , गुप्त कला तथा जैन कला के समन्वय के साथ प्रतिहार वास्तु एवं मूर्तिकला औसियाँ में इस तरह उभर कर आई है की इसकी आगे चलकर सारे  उत्तर भारत में छाप अंकित हो गई।  
खजुराहो में भारतीय मंदिर कला का जो चरम उत्कर्ष दिखाई  है , उसका सूत्र प्रतिहार संस्कृति ही है। मारवाड़ में भी औसियाँ के समकालीन अनेक मंदिरो का निर्माण हुआ ,जिनमे लाम्बा ,बुद्धकला तथा मंडोर के मंदिर महत्वपूर्ण है।  मत्स्य प्रदेश में 800 के आस -पास बना आभानेरी (बांदीकुई-दौसा) का अकेला विशाल मंदिर तो प्रतिहारो की मंदिर निर्माण कला का देदीप्यमान उदाहरण है।  इस मंदिर का विशाल चबूतरा ,असंख्य उत्कृष्ट मूर्तियाँ तथा तिफेरी विशाल बावड़ी विशेष उल्लेखनीय है। 
राजौरगढ़ ,पारा नगर आदि नामों से जाना जाने वाला स्थान कन्नौज के राजा गुर्जर प्रतिहारो की राजस्थान में अंतिम उत्कृष्ट भेंट मानी जा सकती है।  अलवर जिले के सरिस्का के बीहड़ जंगलो में मिलो तक फैली भग्नावेष मंदिरो की परम्परा का इतिहास दो शिलालेखों में मिलता है।  प्रथम शिलालेख से ज्ञात होता है की 
वि. संवत 979 (922 -23) लो वैसाख कृष्णा 13 को प्रतिहार सम्राट महिपाल देव के शासनकाल में सिंहप्रद के शिल्पी सर्वदेव द्वारा निर्मित तीर्थकर शान्तिदेव जैन मंदिर का निर्माण हुआ।  
दूसरे शिलालेख में सावट के पुत्र मथनदेव द्वारा जो कन्नौज की और से यहाँ का राजकाज देखते थे , वि. संवत 1016 (959) में मंदिर के लिए भूमिदान का उल्लेख मिलते है।  यह स्थान राजधानी होने से कला का केंद्र चितौड़ एवं औसियाँ की ही भाँति विकसित हुआ।  6 किमी लम्बे तथा  3 किमी चौड़े स्थान में यहाँ भग्नावेष तथा मूर्तियाँ बिखरी पड़ी है। यहाँ एक दर्जन मंदिरो में से नीलकंठेश्वर महादेव ,शांतिनाथ मंदिर , बतख की देवरी, कोटान की देवरी ,लाछो की देवरी आदि खुदाई करके निकाल लिए गए है।  इनमे केवल नीलकंठेश्वर मंदिर ही सही हालत में है जहाँ आज भी पूजा-अर्चना होती है।  
838 में मिहिरभोज द्वारा कन्नौज को राजधानी बनाने के बाद राजस्थान के मध्यप्रदेश तथा सपादलक्ष में चौहानो की शक्ति उभरी।  इन्होने मंदिर निर्माण की परम्परा को कायम रखते हुए कैकींद , हर्षनाथ , नाडौल आदि स्थानों पर सूंदर मंदिरो का निर्माण कराया।  
दक्षिणी राजस्थान में भी मंदिर निर्माण खूब हुआ।  यहाँ महामाल शैली तथा महागुर्जर शैली से प्रभावित शैली में बाड़ौली , रामगढ ,मेनाल, कंसुआ ,कवालजी के मंदिरो की परम्परा विशेष रूप से उल्लेखनीय है।  हाड़ौती क्षेत्र में मंदिर निर्माण की एक परम्परा दरा (छठी शताब्दी ) से लेकर केशोरायपाटन (पंद्रहवी शताब्दी) तक रही।  राजकीय संग्रहालय कोटा में अटरू ,बाड़ौली-रामगढ़ आदि स्थानों की असंख्य भव्य मूर्तिर्यो इस बात को कह रही है की हाड़ौती का मंदिर शिल्प भी विस्तृत एवं गहन अध्ययन की अपेक्षा रखता है। 
दक्षिण-पश्चिमी राजस्थान का गुजरात से लगा क्षेत्र जैन तथा अपभ्रंश कला का संरक्षक रहा है यहाँ पर स्थान-स्थान पर महागुर्जर शैली की वास्तुकला देखने को मिलती है।  इस दृष्टि से अम्बिका माता का जगत (लगभग 925 ) , सास -बहु (सहस्रबाहु )का मंदिर ,नागदा (लगभग 975) ,लकुलीश मंदिर एकलिंगजी (लगभग 872) ,अरथूना ,देव सोमनाथ ,आहड़ आदि स्थानों के मंदिर विशेष महत्वपूर्ण एवं उल्लेखनीय है।  

जैन मंदिर - मंदिर निर्माण की दृष्टि से राजस्थान में जैन संस्कृति की एक लम्बी परम्परा रही है।  गुर्जर प्रतिहारों , गुहिल्लो ,चौहानों , परमार तथा सोलंकियो ने सौहार्द्र के कारण वैष्णव ,शैव तथा शाक्त मंदिरो के साथ-साथ जैन मंदिरो का भी निर्माण करवाया।  
जैन धर्मावलम्बियों का राज्य शासन में वर्चस्व होने तथा धन-धान्य से परिपूर्ण सेठो का जैन धर्म से सम्बंधित होना भी जैन मंदिर निर्माण परम्परा में महत्वपूर्ण रहा है।  राजस्थान में आठवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी तक अनेक जैन मंदिर बने ,जिनमे महावीर मंदिर,धानोराव,पार्श्वनाथ मंदिर , सादड़ी ,नवलखा पार्श्वनाथ मंदिर ,पाली ,आदिनाथ मंदिर नारलाई तथा नाडोल तथा वर्मन आदि स्थानों के मंदिर विशेष उल्लेखनीय है।  
दक्षिण-पश्चिम राजस्थान जैन धर्म का गढ़ रहा।  इसके कारण भीनमाल ,जालोर ,सिरोही ,आबू आदि नगर इनके व्यापारिक स्थान रहे।  इस क्षेत्र में माउंटआबू के देलवाड़ा मंदिर जैन कला की भव्य प्रस्तुति है।  इन मंदिरो की बहरी दीवारे महत्वपूर्ण नहीं है , पर मूर्तिकला ,बेल-बुंटे ,कमल वन तथा अलंकरण पक्ष मंदिर के आंतरिक सौंदर्य को कला की उत्कृष्टता पर पंहुचा देते है।  इन मंदिरो में संगमरमर पर कोराई तथा घड़ाई का कार्य इतना अलंकृत है की शिल्पकारों का शिल्प देखते ही बनता है।  
1031 में बना विमलशाह का आदिनाथ मंदिर देलवाड़ा का प्राथमिक मंदिर है।  अपने भाई की याद में वस्तुपाल तेजपाल ने 1230 में नेमिनाथ के मंदिर का निर्माण कराया , जिसमे प्रमुख वास्तुकार शोभनदेव था।  देलवाड़ा के मंदिर सोलंकी कला के उत्कृष्ट उदाहरण कहे जा सकते है।  इस परम्परा को आबू के पास चंद्रावती तथा सिरोही के विभिन्न मंदिरो में भी देखा जा सकता है।  
जैन मंदिरो की इसी परम्परा में रणकपुर के चतुर्मुख जैन मंदिर पंद्रहवी शताब्दी के कलात्मक मंदिरो में गिने जाते है।  जैन मंदिर कला का विशाल परिप्रेक्ष्य रणकपुर के मंदिरो में देखा जा सकता है।  मकराणा (पाली) का पार्श्वनाथ मंदिर ,जालौर ,कैकींद , सांगानेर (जयपुर) , चितौड़ के जैन मंदिर भी विशेष उल्लेखनीय एवं दर्शनीय है।  पंद्रहवी शताब्दी के लोद्रवा तथा जैसलमेर के जैन मंदिर मंदिर-कला की परम्परा को ही उजागर नहीं करते, अपितु उन्होंने आक्रमण के समय कलात्मक वस्तुओ की रक्षा भी की।  
बारहवीं शताब्दी के बाद से नागर शैली के मंदिरो के कलात्मक पक्ष का हास होने लगा तथा मुस्लिम आक्रमणों द्वारा कलात्मक मंदिरो को हानि पहुंचाई गई। ाजे चलकर राजस्थान के रजवाड़ो में हवेली शैली के मंदिरो का निर्माण हुआ।  


अगर आपके कोई सवाल हो या अन्य कोई जानकारी चाहिए तो आप हमें comment Box में कमेंट करे।
हमारी website SSV Education में visti करने का धन्यवाद ! आपका दिन मंगलमय हो।