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Rajasthan ki chitrakala Part-2

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Rajasthan ki chitrakala Part-2 

Rajasthan ki chitrakala Part-2 

  राजस्थानी चित्रकला में चटकीले-भड़कीले रंगों का प्रयोग किया गया है। विशेषतः पीले व लाल रंग का सर्वाधिक प्रयोग हुआ है।  राजस्थान की चित्रकला शैली में अजंता व मुग़ल शैली का सम्मिश्रण पाया जाता है।    जैसलमेर तथा शेखावाटी के कतिपय गाँवो में भित्ति चित्रों की अधिकता है परन्तु वे लोक कला के अंतर्गत माने जा सकते है।  वे अधिक श्रम साध्य और उत्कृष्ट नहीं है।  
राजस्थानी चित्रकला की प्रमुख शैलियाँ निम्नलिखित है - 

बीकानेर शैली - मारवाड़ी शैली से ही सम्बंधित बीकानेर शैली भी है , जिसका समृद्ध स्वरूप अनूपसिंह के राज्यकाल में था उसके समय के प्रसिद्ध कलाकरों में रामलाल , अलीरजा , हसन आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय है।  इस शैली में पंजाब की कलम का भी प्रभाव देखा गया है , क्योकि भौगोलिक स्थिति के कारण बीकानेर उत्तरी भाग से प्रभावित रहा है।  दक्षिण से दूर होने पर भी यहाँ फव्वारों , दरबार दिखावो आदि में दक्षिणी शैली का प्रभाव दिखाई देता है , क्योकि यहाँ के शासको की नियुक्ति दक्षिण में बहुत रही है।

बूंदी शैली - राजस्थानी शैली के अंतर्गत बूंदी शैली का भी बड़ा ही महत्व है।  प्रारम्भिक काल में राजनीतिक अधीनता के कारण बूंदी कला पर मेवाड़ शैली का बहुत प्रभाव रहा है।  इस स्थिति को व्यक्त करने वाले 1625 के लगभग दो चित्र जिनमे एक रागमाला और दूसरा भैरवी रागिनी का है , बड़े उपादेय है।  इन चित्रों में पटोला , नकीली नाक , मोटे गाल , छोटा कद और लाल-पीले रंग की प्रचुरता स्थानीय विशेषताओं की घोतक है।  इनमे गुंबज का प्रयोग और बारीक़ कपड़ो का दिखावा मुगली है।  स्त्री की वेशभूषा मेवाड़ी शैली की है।  इस शैली में राव सुर्जन के काल में (1554-1585) , जिसने मुगलिया अधीनता स्वीकार कर ली थी , एक नया मोड़ आता है, जिसमें चित्र बनाने की पद्धति में मुगलीपन बढ़ता जाता है।  राव रंतानसिंह के समय में , जो जहांगीर का कृपा पात्र था , और राव माधोसिंह के समय में जो शाहजहाँ का कृपा पात्र था , मुगली ठाठ का दौर अधिक बढ़ गया था।  चित्रों में बाग , फव्वारे ,फूलो की कतार , तारों की रातें आदि का समावेश मुगली ढंग से किया जाने लगा।  इस शैली की विशेषताओं के चित्र कार्ल खंडालवाला द्वारा सम्पादित बूंदी चित्रावली में तथा कोटा के जालिमसिंह की हवेली में है।  इन चित्रों में स्त्रियों के चेहरे मेवाड़ी है और फल-फूल , पानी और वृक्षावलियों का चित्रण बूंदी का है।  चित्रों के चेहरे कुछ लाल रहते है तथा गाल , आँख और नाक के पास कुछ परछाई-सी दिखाई जाती है। कोटा में भी राजनीतिक स्वतंत्रता से नवीन शैली आरम्भ होती है परन्तु वह बूंदी शैली के आधार पर ही चलती है।  बूंदी पेंटिंग में नायिका के स्नान के चित्र की हूबहू नक़ल जालिमसिंह की हवेली के ऊपर वाले बायें हाथ के कमरे में , द्वार के पास की भित्ति पर बनी हुई है , जो उक्त चित्र के सभी विषयो से समान -सी है। इससे स्पष्ट है की आगे चलकर भी कोटा शैली बूंदी शैली से अलग नहीं हो सकी।  इसी प्रकार कोटा संग्रहालय में ऐसे अनेक चित्र है , जो कोटा में बने थे फिर भी उन्हें बूंदी शैली से अलग नहीं किया जा सकता।

किशनगढ़ शैली - सुंदरता की दृष्टि से किशनगढ़ शैली के चित्र बड़े रोचक एवं आकर्षक है।  जोधपुर से वंशीय सम्बन्ध होने पर और जयपुर से निकट होते हुए भी किशनगढ़ में स्वतंत्र शैली विकसित हुई , यह एक बड़े महत्व की बात है।  अन्य स्थानों की भाँति यहाँ भी चित्र प्राचीनकाल से बनते रहे , परन्तु किशनगढ़ शैली का समृद्धकाल सावंतसिंह से जो नागरीदास के नाम से अधिक विख्यात है (1699 - 1764) , आरम्भ होता है।  नागरीदास की शैली में वैष्णव धर्म के प्रति श्रद्धा , चित्रकला में रूचि और अपनी प्रेयसी बनी-ठनी के प्रेम का बड़ा हाथ रहा है। इस काल के चित्रों के सृजन का श्रेय उनके समकालीन कलाकार निहालचंद को है।  नागरीदास का वैष्णवधर्म इतना विश्वास था और उनका प्रेम बनी-ठनी से उस कोटि का था कि वे उनके पारस्परिक प्रेम में राधा-कृष्ण की अनुभूति करते थे।  उन दिनों  इसी भाव व्यक्त करते थे।  कला , प्रेम और भक्ति का सर्वांगीण सामंजस्य हम किशनगढ़ शैली में पाते है। चित्र के विषयों के आधार पर ही ब्रज भाषा में कविताएँ बनाई गई है और वैषणव संप्रदाय से सम्बन्ध रखने वाले अनेक चित्र भी बनाये गए।  इस शैली के चेहरे लम्बे , कद लम्बा और नाक नुकीली रहती है।  स्थानीय गोदोला तालाब तथा किशनगढ़ के नगर का दूर से दिखाया जाना इस शैली की विशेषताओं में है।  इस शैली की वेशभूषा फर्रूखसियरकालीन है।  इन विशेषताओं को हम वृक्षों की घनी पत्रावली वाले दिखावों अट्टालिकाओं तथा राज के दरबारी जीवन की झांकियों सांझी के चित्रों और नागरीदास तथा बनी-ठनी के वृन्दावन सम्बन्धी चित्रों में पाते है।  बाद के चित्रों में नंदराम और रामनाथ ने भी इस शैली का उपयोग किया था।

जयपुर शैली - राजस्थानी शैली में यदि मुग़ल शैली का कहीं आधिक्य रहा है तो वह जयपुर तथा अलवर शैली में है।  इसका कारण भी स्पष्ट है।  इन राज्यों का मुगलो से सम्बन्ध निकट का बना रहा था।  विशेष रूप से मुग़ल जीवन और नीति पर जयपुर के महाराजाओ के प्रभाव की बड़ी छाप रही थी।  यहाँ के चित्रों में रास-मंडल , बारहमासा , गोवर्धन-धारण , गोवर्धन-पूजा आदि के चित्र उल्लेखनीय है।  पोथीखाने के आसावरी रागिनी चित्र और उसी मण्डली के अन्य रागों के चित्रों में स्थानीय शैली की प्रधानता दिखाई देती है। कलाकारों ने आसावरी रागिनी के चित्र में शबरी के केशों , उसके अल्प कपड़ो , आभूषणों तथा चन्दन के वृक्ष चित्रण में जयपुर शैली की प्राचीनता को तथा वास्तविकता को खूब निभाया है। इसी तरह पोथीखाना के सत्रहवीं शताब्दी के भागवत के चित्रों में , जो लाहौर में एक खत्री के द्वारा तैयार करवाये गये थे , स्थानीयता का अच्छा दिग्दर्शन है।  अठारहवीं सदी की भागवत में रंगों की चटक मुगली है।  चित्रों में द्वारिका का चित्रण जयपुर नगर की रचना के आधार पर है और कृष्ण अर्जुन की वेशभूषा मुगली है। जयपुर शैली के आभूषणों में मुगली प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।  उसके द्वारा हम कई मुगली आभूषणों और जयपुर की कला का अध्ययन कर सकते है।  स्त्रियों की वेशभूषा में मुगलीपन अधिक है। उनके अधोवस्त्र में घेरदार घाघरा ऊपर से बांधा जाता है और स्त्रियों को पायजामा तथा छोटी ओढ़नी पहनाई जाती है, जो मुगली परम्परा के अनुकूल है। चेहरों की चिकनाहट और गौरवपूर्ण फारस शैली के अनुकूल है। पोथीखाना के स्टेण्डों पर लगे हुए चित्रों में फकीरो को भिक्षा देती हुई स्त्रियाँ ,कुरान पढ़ती हुई शाहजादी ,जहाज आदि के चित्रों में जयपुर शैली का अच्छा प्रदर्शन है।

अलवर शैली - अलवर शैली के चित्रों में मुग़ल सम्राटों के और उनके अधिकारियो के चित्र , रागिनी के चित्र आदि स्थानीय संग्रहालय में सुरक्षित है। इस शैली के चित्र , रागिनी के चित्र आदि स्थानीय संग्रहालय में सुरक्षित है। इस शैली के चित्र औरंगजेब के काल से लेकर पिछले मुगलकालीन सम्राटों तथा कम्पनी काल तक प्रचुर मात्रा में मिलते है।  जब औरंगजेब ने अपने दरबार की सभी कलात्मक प्रवृतियों को तिरस्कृत  देखना शुरू ,किया तो राजस्थान की और आने वाले कलाकारों का प्रथम दल अलवर में टिका , क्योंकि मुग़ल दरबार से यह राज्य सबसे निकटतम था।  मुग़ल शैली  का प्रभाव वैसे तो पहले से यहाँ पर था , पर उस स्थिति में यह प्रभाव अधिक बढ़ गया।

नाथद्वारा शैली - जिस तरह से जोधपुर और जयपुर से सम्बंधित होते हुए भी किशनगढ़ शैली अपने ढंग की निराली है , उसी प्रकार मेवाड़ में होते हुए भी नाथद्वारा शैली , अपनी विलक्षणता लिए हुए है।  इस शैली  प्रारंभ 1671 से होता है , जब श्रीनाथजी की मूर्ति ब्रज से यहाँ लायी गई। तभी से इनके साथ आये हुए ब्रजवासी चित्रकार श्रीनाथजी के प्रागट्य  छवियों बनाने लगे।  क्योंकि महाराणा राजसिंह के कारण मूर्ति को यहाँ रखा गया , प्रागट्य की छवियों में महाराणा तथा रानियों के भक्ति भाव का दिखावा भी उनके साथ जोड़  दिया गया।  बड़ौदा  चित्रपट्ट इसी भाव को व्यक्त करता है। धीरे-धीरे नाथद्वारा वैष्णव धर्मावलम्बियों का यात्रा-स्थल बनता चला गया।

Rajasthan ki chitrakala Part-1

Rajasthani chitra sheliyo ki visheshta

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