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Rajasthan ki chitrakala-राजस्थान की चित्रकलाएँ Part-1

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Rajasthan ki chitrakala-राजस्थान की चित्रकलाएँ 

Rajasthan ki chitrakala राजस्थान की चित्रकलाएँ 

राजस्थानी लोक चित्रकला की समृद्धिशाली परम्परा रही है।  इसको इस प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है -
(1) भित्ति एवं भूमि चित्र
                 (अ) आकारद चित्र - भित्ति , देवरा , पथवारी आदि।  
                 (ब) अमूर्त , सांकेतिक चित्र - ज्यामितीय सांझी व मांडणा आदि।  
(2) कपडे पर निर्मित चित्र - पटचित्र , पिछवाई , फड़ आदि।  
(3) कागज पर निर्मित चित्र - पाने।  
(4) लकड़ी पर निर्मित चित्र - कावड़ , खिलोने आदि।  
(5) पक्की मिट्टी पर निर्मित चित्र - मृद्पात्र , लोक देवता , देवियाँ व खिलोने आदि।  
(6) मानव शरीर पर चित्र - गुदना व मेहँदी आदि।  

राजस्थान चित्रकला की शैलिया 


राजस्थान चित्रकला की प्रमुख शैलियाँ इस प्रकार है : -
  1. मेवाड़ शैली 
  2. मारवाड़ शैली 
  3. बीकानेर शैली 
  4. बूंदी शैली 
  5. किशनगढ़ शैली 
  6. जयपुर शैली 
  7. अलवर शैली 
  8. नाथद्वारा शैली 

राजस्थानी चित्रकला की विशेषताएँ :-

  • पूर्णतः भारतीय चित्र बनाये गए।  
  • चित्रकला में अलंकारिता की प्रधानता।  
  • मुग़ल प्रभाव के फलस्वरूप राजस्थानी चित्रकला में व्यक्ति चित्र बनाने की परम्परा शुरू हुई , जिन्हे सबीह कहा गया।  इस प्रकार के चित्र जयपुर शैली में सबसे अधिक बनाये गए है। . 
  • राजस्थान की चित्रकला में पट चित्र बनाये गये।  इस प्रकार चित्र अधिकतर कृष्ण-भक्ति से सम्बंधित है।  
  • यहाँ के  प्राकृतिक अलंकरणों से सुसज्जीत है।  
  • राजस्थानी चित्रकला को राजपूत चित्रकला शैली भी कहा जाता है।  
  • मेवाड़-राजस्थानी चित्रकला का उद्गम स्थल।  
  • दसवैकालिक सूत्र चूर्णि , आधनिर्युक्ति वृति - जैसलमेर के प्राचीन भंडारों में उपलब्ध इन चित्रों को भारतीय कला का दीप-स्तम्भ मन जाता है।  

राजस्थानी चित्रकलाएँ  Rajasthani chitrakala 

उदयपुर के चित्र संख्या में अधिक है , किन्तु जयपुर जैसा सौंदर्य इन चित्रों में नहीं।  भित्ति चित्रों की पद्धति जयपुर , अलवर , कोटा , बूंदी में ही अधिक प्रस्फुटित हुई , इसका एक छोर वल्लभ संप्रदाय की सगुण उपासना है , तो दूसरा छोर मुग़ल घरानो के अनुक्रमण की परम्परा है।  कोटा , बूंदी , बल्लभीय उपासना के केन्द्र हैं और जयपुर , अलवर मुसलमान परम्परा के प्रतीक है।  
जैसलमेर तथा शेखावाटी के कतिपय गाँवो में भित्ति चित्रों की अधिकता है परन्तु वे लोक कला के अंतर्गत मने जा।   वे अधिक श्रम साध्य और उत्कृष्ट  नहीं है।  

राजस्थान चित्रकला की प्रमुख शैलियाँ निम्नलिखित है -

(1) मेवाड़ शैली- राजस्थानी चित्रकला का प्रारम्भिक और मौलिक रूप , जो सामंजस्य के फलस्वरूप बन पाया था , मेवाड़ शैली में पाया जाता है।  वल्लभीपुर से गुहिल वंशीय राजाओं के साथ ये कलाकार वहाँ से सर्वप्रथम मेवाड़ आये और उन्होंने अजन्ता परम्परा को प्रधानता देना शुरू किया।  स्थानीय विशेषताओं से मिलकर यह परम्परा अपना स्वतंत्र रूप बना सकी, जिसे हम 'मेवाड़ शैली' कहते है।  1261 का श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि नामक चित्रित ग्रन्थ इसी शैली का प्रथम उदाहरण है।  
इसकी वेशभूषा नागदा के मंदिर और चितौड़ के मोकल के मंदिर की तक्षण-कला से साम्यता लिए हुए है।  इस शैली की विशेषता में सवाचश्म , गरुड़ नासिका , परवल की कड़ी फांक से नेत्र , घुमावदार व लम्बी उंगलियाँ , लाल-पीले रंग का बाहुल्य , गुडिकार जन-समुदाय , अलंकार बाहुल्य , चेहरों की जकड़न आदि मुख्य विशेषताएँ है। वही शैली 1423 में दिलवाड़ा में लिखी गई सुपासनाचर्यम पुस्तक में दिखाई देती है।  इसी शैली की लड़ी में 1536 के कल्पमल्लयुद्ध आदि के चित्र है जो वे उस समय की सामाजिक तथा धार्मिक अवस्था पर अच्छा प्रकाश डालते है।  इनमें चित्रित वेशभूषा कुम्भा के विजयस्तम्भ की मूर्तियों की वेशभूषा के अनुरूप है।  
मेवाड़ शैली का समृद्ध रूप हमें चितौड़ के प्राचीन महलों के रंगो तथा फूल की पंखडियो की रेखाओ में दिखाई देता है।  जो सदियों के बीत जाने पर और अनारक्षित होते हुए आज भी नवीन और सजीव दिखाई देता है।  इस शैली का एक रागिनी चित्र श्री गोपीकृष्ण कानोडिया के संग्रह में है , जो 1605 में चावंड में बनवाया गया था।  रोजकता और मौलिकता की दृष्टि में यह चित्र अपने ढंग का अनूठा है।  
जब मुगलो के साथ मेवाड़ राज्य ने राणा अमरसिंह के समय 1615 में संधि की तब से उतरोतर मेवाड़ शैली में मुगलई विशेषताओं का समावेश होने लगा जो 1625 - 1652 तक के काल में जाकर परिपक्व हो गया।  इस अवधि में मेवाड़ में जितने सुंदर चित्रों का सृजन हुआ , वैसा किसी युग में न हो सका।
इस शैली के अनेक ग्रन्थ मेवाड़ और मेवाड़ के बाहर अन्य राजस्थानी भागो में चित्रित किए जाने लगे।  साहबदीन द्वारा चित्रित मेवाड़ का भागवत (1648) , जोधपुर और कोटा  भागवत की प्रतियाँ , मनोहर द्वारा चित्रित प्रिंस ऑफ़ वेल्स म्यूजियम की रामायण (1649) , साहबदी द्वारा सरस्वती भंडार , उदयपुर की आर्षरामायण (1651) , नेशनल म्यूजियम की रागमाला , बीकानेर की रसिकप्रिय , 1650 का प्रिंस ऑफ़ वेल्स का गीत गोविन्द , श्री गोपीकृष्ण कनोडिया के संग्रह का सूरसागर आदि चित्रित ग्रन्थ इस युग की मेवाड़ शैली के अनुपम उदाहरण है।  भागवत ( श्री गोपीकृष्ण कानोडिया के संग्रह ) सूकर क्षेत्र महात्म्य (1712 वि.) कादम्बरी , एकादशी महात्म्य , पंचतंत्र , मालती माधव , सुन्दर श्रृंगार  (1782 वि.) आदि ग्रन्थ चित्रित किए गए।
इस शैली के चित्रों में चमकीले पीले रंग और लाख के लाल रंग की प्रधानता देखी जाती है।  पुरुषो और स्त्रियों की आकृति में लम्बे नाक , गोल चेहरे , छोटा कद और मीनाक्षी आँखें रहती है।  पुरुषो की वेशभूषा में जहांगीरी पटका , अटपटी पगड़ी और चाकदार जामा रहता है , जो मुगलो का प्रभाव है।  इसी प्रभाव का स्वरूप बारीक़ कपड़ो में भी पाया जाता है।  गुंबजदार मकानों को बनाना मुगली शैली  प्रभाव है।  पहाड़ी दिखावो  फारस-कला , जो गुजरात कला के साथ यहाँ आई , स्पष्ट झलकती है। इस शैली के चित्रों आम-तौर से बदली वृक्षों का चित्रण स्थानीय परम्परा पर आधारित है।

(2) मारवाड़ शैली - मेवाड़ की भाँति मारवाड़ में भी अजंता परम्परा लगभग उसी काल में प्रविष्ट हो सकी , जिस काल में वह मेवाड़ की और चली थी।  इस शैली का पूर्व रूप मंडोर के द्वार की कला से आंका जा सकता है।  तारानाथ के कथनानुसार इस शैली का सम्बन्ध श्रृंगार से है जिसने मारवाड़ शैली को स्थानीय तथा अजंता परम्परा के सामंजस्य द्वारा जन्म दिया।  इस शैली के आधार पर 687 ई. में शेषनाग ने एक धातु की मूर्ति तैयार की जो पिंडवाड़ा में है।  कला की दृष्टि से यह बड़ी रोचक है और यह सिद्ध करती है की मारवाड़ चित्रकला और मूर्तिकला में  तक अच्छी प्रगति कर चूका था।  
इसके बाद मारवाड़ में यही परम्परा वृद्धि पाती रही , जिसके फलस्वरूप यहाँ लगभग 1000 से 1500 ई. तक अनेक जैन ग्रंथो को चित्रित किया जाता रहा।  इस युग के कुछ ताड़पत्र , भोजपत्र आदि पर चित्रित कल्पसूत्रों व अन्य ग्रंथो की प्रतियाँ जोधपुर पुस्तक प्रकाश में तथा जैसलमेर जैन- भंडार में सुरक्षित है।
ठीक इस युग के पश्चात् कुछ समय तक मारवाड़ पर मेवाड़ का राजनीतिक प्रभुत्व रहा और लगभग महाराणा मोकल के काल से लेकर राणा सांगा के समय तक मारवाड़ में मेवाड़ शैली के चित्र बनते रहे।  मालदेव के सैनिक प्रभाव ने (1532-68 ई.) इस प्रभाव को कम कर मारवाड़ शैली का फिर स्वतंत्र स्वरूप बनाया।  इस प्रणाली के आधार पर उतरध्यानसूत्र का 1591 में चित्रण किया गया जो बड़ौदा संग्रहालय में सुरक्षित है।  मालदेव की सैनिक रूचि की अभिव्यक्ति चोखेला महल , जोधपुर की बल्लियों और छतो के चित्रों से स्पष्ट है , जिसमे राम-रावण युद्ध तथा सप्तशती के अनेक अवतरणों को चित्रित किया गया है।  जिनमे चेहरों की बनावट भावपूर्ण दिखाई गई है।
जब मारवाड़ का सम्बन्ध मुगलो से बढ़ता गया तो मारवाड़ शैली का बाह्य रूप मुगली होता गया।  इस अवस्था का दिग्दर्शन 1610 ई. की भागवत से होता है।  इसमें अर्जुन-कृष्ण आदि की वेशभूषा मुगली है , परन्तु उनके चेहरों की बनावट स्थानीय है।  इस प्रकार गोपिकाओ की वेशभूषा मारवाड़ी ढंग की है , परन्तु उनके गले के आभूषण मुगली है।  इस ग्रन्थ में पाठशाला और आँख मिचौनी के दिखावे स्थानीय है , परन्तु चित्रों के शीर्षक नागरी लिपि में गुजराती भाषा में दिए गए है।
मारवाड़ शैली प्रमुख चित्र - मूमल निहालदे , ढोला मारु , कल्याण रागिनी , रूपमति बाज बहादुर , जंगल में कैम्प , मरू के टीले।
औरंगजेब और अजीतसिंह के काल में मुगली विषयो को प्रधान्यता दी जाने लगी।  ऐसी विषयों में अन्तः पुर की रंगरेलियाँ , स्त्रियों के स्नान , होली के खेल , शिकार आदि को चित्रित किया जाने लगा।  विजयसिंह और मानसिंह के काल में भक्तिरस और श्रृंगार रस के अधिक चित्र तैयार किये गये , जिनमे नाथचरित्र , भागवत शुकनासिकाचरित्र , पंचतंत्र आदि प्रमुख है।  ये चित्र महाराजा के पुस्तक प्रकाश पुस्तकालय में सुरक्षित है।
मारवाड़ शैली में लाल और पीले रंग का प्रयोग अधिक किया गया है , जो स्थानीय विशेषता है।  इस शैली के पुरुष और स्त्रियों गठीले आकार की होती है और पुरुषो के गलमुच्छ , ऊंची पगड़ी तथा स्त्रियाँ के लाल फुँदने का चित्रों में प्रयोग किया जाता है।  इस शैली में सामाजिक जीवन के हर पहलु के चित्र अठारहवीं शताब्दी से ज्यादा मिलने लगते है।  उदाहरणार्थ , पंचतंत्र तथा शुकनासिकाचरित्र आदि में कुम्हार , धोबी , मजदुर , लकड़हारा , चिड़ीमार , भिश्ती , सुनार , सौदागर , पनिहारी , ग्वाला , माली , किसान आदि से सम्बंधित जीवन की घटनाओ का चित्रण मिलता है।  अठारहवीं शताब्दी के चित्रों में सुनहरी रंग का प्रयोग मुगली ढंग से खूब किया गया है।

Rajasthan ki chitrakala Part-2

Rajasthani chitra sheliyo ki visheshta

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