Rajasthani chitra sheliyo ki visheshta

Rajasthani Chitra Sheliyo ki visheshta राजस्थान चित्र शैलियों की विशेषता , मेवाड़ शैली की शैलीगत विशेषताएँ , मारवाड़ शैली की विशेषता , हाड़ोती शैली की विशेषता , ढूंढाड़ शैली की विशेषता , राजस्थानी चित्रकला की विशेषताएँ, लोक चित्रकला , भित्ति चित्र व भूमि चित्र , कागज पर निर्मित चित्र , लकड़ी पर निर्मित चित्र , मानव शरीर पर निर्मित चित्र राजस्थानी चित्रकला की विभिन्न पद्धतियाँ  आदि की संक्षिप्त जानकारी दी जायेगी।
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Rajasthani chitra sheliyo ki visheshta

Rajasthani Chitra Sheliyo ki visheshta -राजस्थान चित्र शैलियों की विशेषताएँ 

सोलहवीं शताब्दी से पूर्व राजस्थान में चित्रकला सम्बन्धी जो भी सामग्री प्रकाश में आयी है , उस पर पश्चिम भारतीय कला का प्रभाव स्पष्ट है।  जैन ग्रन्थ भंडार जैसलमेर , पाटन ग्रन्थ भण्डार व अमेरिका के बोस्टन संग्रहालय में संग्रहित दस वैकल्पिक सूत्र, कल्पसूत्र, स्रावक-प्रतिक्रमण-सूत्र-चूर्णि आदि चित्रित ताड़पत्रीय ग्रंथो व काष्ठपटलियो और कागज पर चित्रों में पश्चिमी भारतीय चित्रकला का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।  
सत्रहवीं शताब्दी में राजस्थान की रियासतों में पुरानी चित्रकला परम्परा में परिवर्तन आया और उनकी अपनी-अपनी चित्रशैलीयो ने स्वतंत्र रूप धारण किया , जिनमें मेवाड़ , मारवाड़ , हाड़ौती और ढूंढाड़ प्रमुख है।  इन प्रमुख शैलियों की उप शैलियाँ भी अठारहवीं शताब्दी में विकसित हुई।  इन उप-शैलियों की विशेषताओं का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है-
मेवाड़ शैली 
क्षेत्र-चितौड़ , उदयपुर , भीलवाड़ा व निकटवर्ती क्षेत्र।
काल- सत्रहवीं से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी। मेवाड़ क्षेत्र में चित्रकला के साक्ष्य पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी के मिले है।
संरक्षक-महाराणा अमरसिंह प्रथम से लेकर भीमसिंह तक।
विषय-रामायण , भागवत , गीतगोविन्द , सूरसागर , गजेन्द्र मोक्ष ,शुक्रक्षेत्रमहात्मय , रसिकप्रिया , पंचमंत्र , प्रबोधचन्द्रोदय , रघुवंश , सारंगधर , हरिवंश , वशिष्ट , कलिकादमन , शबीहें , शिकार चित्र आदि।
कलाकारों के नाम- साहिबदीन, मनोहर , भैरु , कृपाराम , श्योबक्स रामप्रताप , नयनचन्द्र , जीवा , अमरा , शिवदयाल , रघुवंश आदि।
रंग- लाल(हिंगलू) का अधिक प्रयोग , किनारे पर लाल व काले रंगों का मिश्रण।
शैलीगत विशेषताएँ - चेहरे का निम्न भाग गोल , आँखें कमल/मीन के समान , कटि विशाल , शरीर स्थूल , नथ के मोती नासिकाग्र पर और गालों पर प्रायः तिल का निशान चित्रित रहता है। नासिका दीर्घ , भौहें नीम के पते की भाँति , वेणी नितम्बों तक जाती हुई , पुरुषों की मूछे बड़ी , कानों में मोती और गालों तक आती जुल्फें ,ऊंचाई साधारण , बादलों से युक्त नीला आकाश , आम कदम्बादि वृक्ष , कोयल , सारस व मछलियों से युक्त भरपूर प्रकृति चित्रण।

मारवाड़ (जोधपुर) शैली
क्षेत्र-एकीकरण से पूर्व का जोधपुर राज्य।
काल- सत्रहवीं शताब्दी से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी तक।
संरक्षक- महाराजा सूरसिंह , जसवंतसिंह , अभयसिंह व मानसिंह और तख्तसिंह।
विषय- भागवत , रागमाला , ढोलामारु , दरबारी व शबीहे , श्रृंगार रास पर आधारित चित्र।
कलाकारों  के नाम - वीरजी , नारायण दास भाटी , किशनदास भाटी , शिवदास व देवदास आदि।
रंग- पीले रंग का अधिक प्रयोग , किनारों पर पीले एवं लाल रंग का अधिक प्रयोग।
शैलीगत विशेषताएँ - पुरुष व नारियों की आँखें बादाम और धनुष की भाँति , पुरुषाकृतियों की ऊँची पगड़ी , गलमुच्छें , भारी भरकम देह पर तलवार/कटारें सुशोभित , कद लम्बा , ग्रीवा मोटी , घेरदार जामे पाजामा पहने चित्रित है और नारी आकृतियाँ तन्वी , दीर्घ कलेवर और उनकी कटि पतली , मांसल चिबुक पर तिल के निशान , नासापुट विकसित और भौहें कानों तक जाती , गहरे काले रंग के बादल , ऊंट व घोड़ों पर सवार पुरुष।

हाड़ौती : बूंदी शैली
हाड़ौती शैली में प्रारम्भिक स्वरूप बूंदी शैली का है।  इसमें कोटा रियासत स्थापित हो जाने अठारवीं शताब्दी के प्रारम्भ में अपना अलग अस्तित्व कायम किया।
क्षेत्र- बूंदी , कोटा , इन्द्रगढ़।
काल - सत्रहवीं से लेकर अठारहवीं शताब्दी तक।
संरक्षक - राव छत्रसाल , भावसिंह , अनिरुद्ध , बुधसिंह , उम्मेदसिंह , विशनसिंह आदि।
विषय - संस्कृत व हिंदी साहित्यिक कृतियों पर आधारित विषय , राग-रागिनी , बारहमासा , नायिकाभेद , कृष्ण लीला , दरबारी व शिकार दृश्य आदि।
कलाकारों के नाम - सुरजन , अहमद , रामलाल , श्रीकृष्ण , मीरबगस , डालू।
रंग - लाल , हरे व सफ़ेद रंगों का अधिक प्रयोग।
शैलीगत विशेषताएँ - साधारण आकृतियाँ लम्बी , होठों के मध्य पतली रक्ताभ रेखा , आँख कमलपत्र की भाँति , घनी भौहें , गालों तक आते केश व नथ के मोती शबीहों में छाया प्रकाश का प्रयोग , मुख गोल , पुरुषों की आकृतियों में नीचे की ओर झुकी पगड़ी।

ढूँढाड़ शैली (आमेर-जयपुर)
ढूँढाड़ शैली की उप शैलियाँ विकसित हुईं परन्तु यहाँ केवल आमेर-जयपुर शैली के विषय में संक्षिप्त जानकारी दी जा रही है।
क्षेत्र - आमेर , ,जयपुर , शेखावटी।
काल - सत्रहवीं से लेकर अठारहवीं शताब्दी तक।
संरक्षक - महाराजा मानसिंह प्रथम , मिर्जा राजा जयसिंह , सवाई जयसिंह , ईश्वरीसिंह , माधोसिंह , प्रतापसिंह तथा उनके अधीन जागीरदार।
विषय - नायिका भेद , राग रागिनी , बारहमासा , कृष्णलीला तथा धार्मिक चित्र , राजाओं , सरदारों की शबीहें।
रंग - लाल , पीला , हरा , सुनहरा , मोतियों का प्रयोग , हाशिये में ,  चाँदी  का भी प्रयोग।
कलाकारों के नाम - साहिबराम , लालचन्द , हुकुमचन्द , मुरली , बनवास , गंगाबक्स , सालिगराम , मन्नालाल , लालचंद।
शैलीगत विशेषताएँ - पुरूष पात्रों के चेहरे गोल , आँखें मीन की भाँति , जामा पाजामा पहने , नारी पात्रों की केशराशि लम्बी , धनुषाकार भौहें , उन्नत उरोज , सीधी अलकावलियाँ व कटि खिंची हुई।  पारम्परिक वस्त्र , आभूषणों में मोतियों का प्रयोग।  त्रिवली युक्त कंठ चित्रित किये जाते थे।


चित्रकला एवं विभिन्न चित्र - शैलियाँ
राजस्थानी चित्रकला  चटकीले- भड़कीले रंगो का प्रयोग किया गया है।  विशेषतः पीले व लाल रंग का सर्वाधिक प्रयोग हुआ है।
राजस्थान की चित्रकला शैली  अजंता व मुग़ल शैली का सम्मिश्रण पाया जाता है।

राजस्थानी चित्रकला की प्रमुख विशेषताएँ
पूर्णतः भारतीय चित्र बनाये गये।
चित्रकला में अलंकारिता की प्रधानता।
मुग़ल प्रभाव के फलस्वरूप राजस्थानी चित्रकला में व्यक्ति चित्र बनाने की परम्परा शुरू हुई , जिन्हें सबीह कहा गया।  इस प्रकार के चित्र जयपुर शैली में सबसे अधिक बनाये गये है।
राजस्थान की चित्रकला में पट चित्र बनाये गये।  इस प्रकार के चित्र अधिकतर कृष्ण-भक्ति से संबंधित है।
यहाँ के चित्र प्राकृतिक अलंकरणों से सुसज्जित है।

राजस्थानी चित्रकला को राजपूत चित्रकला शैली भी कहा जाता है।
मेवाड़- राजस्थानी चित्रकला का उद्गम स्थल।
दसवैकालिक सूत्र चूर्णि , आधनिर्युक्ति वृति - जैसलमेर के प्राचीन भण्डारो में उपलब्ध इन चित्रों को भारतीय कला का दीप-स्तंभ माना जाता है।

लोक चित्रकला
लोक कलाएँ ग्रामीणों के आंतरिक सौंदर्य , सांस्कृतिक परम्पराएँ , अंधविश्वासों व उनकी कलात्मक अभिव्यक्तियों की परिचायक है। लोक चित्रकला को निम्न भागों में विभाजित किया जाता है।

भित्ति चित्र व भूमि चित्र
भराड़ी भील युवती के विवाह पर घर की भीत यानी दीवार पर भराड़ी का आकर्षक और मांगलिक चित्र बनाया जाता है।
भराड़ी भीलों की लोकदेवी है जो गृहस्थ जीवन  प्रवेश कर रहे लाड़ा-लाड़ी (वर-वधु) के जीवन को सब प्रकार से भरा-पूरा रखती है।
सांझी- लोक चित्रकला में गोबर  बनाया गया पूजा स्थल, चबूतरे अथवा आंगन पर बनाने की परम्परा।
संझपा कोट - सांझी का एक रूप।
मांडणा -शाब्दिक अर्थ / उद्देश्य - अलंकृत करना।
यह अमूर्त व ज्यामितीय शैली का अपूर्व मिश्रण होता है , स्त्री के ह्रदय में छिपी भावनाओं , आकांक्षाओं व भय को दर्शाते है।
थापा- दीवार पर हाथ की अंगुलियों से थप्पा देकर बनाई गई चित्राकृति।

Note:-
डब्ल्यू. एच. ब्राउन - इतिहासकार , अपनी पुस्तक इंडियन पेंटिंग में राजस्थानी शैली को राजपूत शैली के नाम से पुकारा।
एन. सी. मेहता - अपनी पुस्तक स्टडीज इन इंडियन पेंटिंग में राजस्थानी चित्रकला को हिन्दू शैली के नाम से पुकारा।
तारानाथ- प्रसिद्ध कला मर्मज्ञ , इन्होंने यह स्वीकार किया की इन चित्रों से चित्रित विशेषता अजंता के चित्रों के सदृश है।
गाथाओं को समझाने के लिये पुस्तकों को चित्रों  अलंकृत किया जाता था।  जैसलमेर में  इस प्रकार के हजारो चित्र प्राप्त हुए है।
राजस्थान के चित्रकार सुंदर एवं बड़ी-बड़ी आँखे बनाते थे , जिन्हें कटाक्ष नेत्र कहा जाता था।
राजस्थानी चित्र अपनी शैली तथा स्वरूप में अजंता के चित्रों से बहुत कुछ मिलते-जुलते है।

कागज पर निर्मित चित्र
पाने- कागज पर बने विभिन्न देवी-देवताओं के चित्र जो शुभ , समृद्धि व प्रसन्नता के घोतक है।
श्रीनाथजी के पाने सर्वाधिक कलात्मक होते है जिन पर 24 श्रृंगारो का चित्रण पाया जाता है।

लकड़ी पर निर्मित चित्र
कावड़ - मंदिरनुमा लाल रंग की काष्ठाकृति होती है जिसमे कई द्वार होते है , सभी कपाटों पर राम , सीता , लक्ष्मण , विष्णुजी व पौराणिक कथाओं के चित्र अंकित रहते है , कथावाचन के साथ-साथ ये कपाट भी खुलते जाते है। यह चारण जाति के लोगों द्वारा बनाया जाता है।
खिलौने - चितौड़गढ़ का बस्सी नामक स्थान कलात्मक वस्तुओं (खिलौनें) लिए प्रसिद्ध है। इसके अलावा खिलौने हेतु उदयपुर भी प्रसिद्ध है।

मानव शरीर पर निर्मित चित्र
गोदना (टैटू) - निम्न जाती के स्त्री-पुरुषों में प्रचलित ; इसमें सुई , बबूल के कांटे या किसी तेज औजार से चमड़ी को खोदकर  काला रंग भरकर पक्का निशान बनाया जाता है।  गोदना सौंदर्य का प्रतीक है।
मेहंदी - मेहंदी का हरा रंग कुशलता  समृद्धि का तथा लाल रंग प्रेम का प्रतीक है।  मेहंदी से हथेली पर अलंकरण बनाया जाता है।
महावर (मेहंदी) - राजस्थान की मांगलिक लोक कला है जो सौभाग्य  का चिन्ह मानी जाती है।  सोजत (पाली) की मेहंदी विश्व प्रसिद्ध है।

राजस्थानी चित्रकला  विभिन्न पद्धतियाँ
तैलरंग विधि- तैल चित्रण के लिए विभिन्न प्रकार भूमिका का प्रयोग किया जाता है।  जैसे-कैनवास, काष्ठ फलक , मोनोसाइट/हार्ड बोर्ड , गैसों , भित्ति आदि।
पेस्टल पद्धति - पेस्टल सर्वशुद्ध और साधारण चित्रण माध्यम है।  इसमें रंगत बहुत समय तक खराब नहीं होती।
जलरंग पद्धति-इसमें मुख्यत कागज प्रयोग होता  है। इस चित्रण में सेबल की तूलिका श्रेष्ठ मानी जाती है।
टेम्परा पद्धति - गाढ़े अपारदर्शक रंगों के प्रयोग को टेम्परा कहा जाता है।  पायस जलीय तरल में तैलीय अथवा मोम पदार्थ का मिश्रण होता है।
वाश पद्धति - इस पद्धति में केवल पारदर्शक रंगों का प्रयोग किया जाता है। इस प्रद्धति में चित्रतल में आवश्यकतानुसार रंग लगाने के बाद पानी की वाश लगाई जाती है।

Rajasthan ki Chitrakala Part-1

Rajasthan ki Chitrakala Part-2


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