Rajasthan ke hastshilp राजस्थान के हस्तशिल्प part-1

Rajasthan ke hastshilp राजस्थान के हस्तशिल्प राजस्थान की हस्तशिल्प कला का इतिहास बहुत प्राचीन है।  यहाँ पत्थर  हथियार , मिट्टी  बर्तन , पकाई मिट्टी  खिलोने , हाथीदाँत की वस्तुएँ , मकान की ईंटे , तांबे की कुल्हाड़ियाँ, कपड़ा बुनाई , रंगाई व छपाई , मीनाकारी , चाँदी ,पत्थर ,कुट्टी , लाख का काम , ब्लू पॉटरी , टैराकोटा , गलीचे व दरियाँ आदि बनाई जाती रही है।
Rajasthan ke hastshilp, राजस्थान के हस्तशिल्प
Rajasthan ke hastshilp राजस्थान के हस्तशिल्प 

Rajasthan ke hastshilp राजस्थान के हस्तशिल्प 

राजस्थान की हस्तशिल्प कला  इतिहास बहुत प्राचीन है।  यहाँ प्राचीन काल  पत्थर  हथियार , मिट्टी के बर्तन , पकाई मिट्टी के खिलोने , हाथीदांत की वस्तुएँ , मकान की ईंटे , तांबे की कुल्हाड़ियाँ आदि बनाई जाती रही है।  
तीसरी शताब्दी तक के कपडे का निर्माण के प्रमाण उपलब्ध हुए है। तीसरी शताब्दी के सिक्कों में चाँदी के काम के प्रमाण भी मिले है।  विराट नगर  बौद्ध चैत्य में ई.पू. तीन सौ वर्ष के आठ पहलु मिले है , जिन पर छब्बीस  लकड़ी के स्तंभ लगे हुई थे ,जो इस  बात का प्रमाण है की राजस्थान में लकड़ी का यह प्राचीनतम काम था।

                    राजस्थान में कपडे की बुनाई ,छपाई ,संगममर व् अन्य पथरो की प्रतिमाये ,जवाहरात की कटाई , मीनाकारी ,  चांदी के आभूषण व अन्य सामग्री ,बंधेज ,हाथी दांत व चन्दन की कुटाई ,लकड़ी की मीनाकारी ,गलीचा ,बुनाई ,पीतल व धातु की कारीगरी ,मिट्ठी व चीनी मिटी के बर्तन ,लाख का काम , चमड़े के जुतिया व अन्य सामान तथा उन पर चित्तकला आदि सभी प्रकार की हस्तशिल्प का सौंदर्यात्मक सराहनीय कार्य होता है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् तो राजस्थान लघु उद्योग निगम व अन्य व्यापारिक संस्थाओ द्वारा हस्त-शिल्प की वस्तुओं का भारी मात्रा में निर्यात होने लगा है।  राजस्थान के हस्त - शिल्प की विदेशी लोग बहुत प्रशंसा  करते है।

कपड़ा बुनाई , रंगाई व छपाई

राज्य में बुनकरों के द्वारा रेजा करीब - करीब सब जगह तैयार किया जाता था किन्तु उत्कृष्ट कपडे में सूत और सिल्क की ताने-बाने का कैथून  मांगरोल(कोटा) का मसूरिया , तनसुख , मथनियाँ (जोधपुर) की मलमल , बीकानेर- जैसलमेर का उन व अन्य स्थानों पर अंगरखा , पायजामा , पगड़ी , पेचा , सेला , साफा , पटका , घाघरा , ओढ़नी व कुर्ती-काँचली आदि विविध मूल्यवान परिधान बनाने के काम होते है।
           रंग-बिंरंगी वेशभूषा राजस्थान की विशेषता रही है। कपड़ो की रंगाई का काम नीलगरो अथवा रंगरेजों द्वारा किया जाता है। भूरे , कत्थई , नीले तथा हरे रंग पक्के समझे जाते है। ऐसे रंग विधवा स्त्रियो द्वारा पहने जाते है।  आसमानी , गुलाबी , लाल , पीले , केसरिया रंग सधवा स्त्रियो पहनती है।  रंगो द्वारा पुराने ज़माने में जातियों की पहचान की जाती थी। यहाँ तक की पहनावे से जातियों का पता चल जाता था।
   
अजमेर-मेरवाड़ा की गुजर स्त्रियो लाल ओढ़नी व फड़द के नीले-काले मिश्रित रंग के घाघरे पहनती है।  मीणो ने भी करीब ऐसा ही पहनावा है , परन्तु वे ऊन का घाघरा नहीं पहनती। विश्नोई स्त्रियो ऊन का पट्टीदार घाघरा पहनती है तथा उन पर ऊन का झुमकेदार नाड़ा लपेटती है।  उनकी ओढ़नी व काँचली कसीदों से सुशोभित होती है , जिसमें काँच भी जड़े होते है।

मारवाड़ में हलके रंग की पोशाक पहनी जाती है।  उन पर गोटा किनारी तथा सलमा का काम अधिक नहीं होता।  मेवाड़ में लाल व हरा रंग पसंद किया जाता है।  आकोला की छपाई के घाघरे वहाँ पर ज्यादा पहने जाते है।  ढूंढाड़ में गहरे रंग के कपडे अधिक पसंद है।  राजस्थान का बंधेज मोठड़ा बहुत प्रसिद्ध है।

शेखावाटी मारवाड़ का बंधेज बारीक़ तथा बढ़िया समझा जाता है।  जयपुर में बंधेज का काम खूब होता है, यहाँ का लहरिया तथा पोमचा प्रसिद्ध है। पोमचा जच्चा स्त्रिया पहनती है। पगड़ियाँ भी लहरियाँ तथा बंधेज की अनेक रंगों में बनती है।  प्राचीन काल में तो पगड़ी के बंधेज से व्यक्तित्व की पहचान हो जाती थी।  जितना उच्च कोटि का तथा श्रेष्ठ व्यक्ति होता था , उसकी पगड़ी उतनी ही बढ़िया होती थी।

बंधेज की विधि या प्रकिया 

बंधेज के लिए कपडे पर गैरु से इच्छित डिजायन तैयार कर लिया जाता है।  बंधेज वाले हिस्से को अंगुली से लोहे का नेहला पहन कर डिजायन वाले भाग को उसकी  नोक पर उभार लिया  जाता है , उस भाग को राल मिटटी भिगोये डोरे की लपेटो से बांधकर ऐसा कर लिया जाता है की उस जगह अन्य रंगे जाने वाले भागों का रंग न पहुंचे।
अलग-अलग रंगो के प्रतिरोध के लिए जिस भाग को दूसरे भाग से बचाया जाता है , उसमे राल मिश्रित मिटटी लगा दी जाती है।  इच्छित  रंगो से सम्पूर्ण रंगाई होने पर डोरे खोल दिए जाते है  तथा खोलने पर डिजाइन वाला भाग सफ़ेद निकल जाता यही बंधेज कहलाता है।  
राजस्थान के छिपो ने विभिन्न प्रकार के बेल-बूटों का पक्के रंगों में छपाई का काम किया है जो विश्व भर में प्रसिद्ध है।  छपाई के लिए बालोतरा , बाड़मेर , पाली , जैसलमेर , आकोला , चितौड़ , आहड़ , बगरू , सांगानेर , कालाडेरा आदि प्रसिद्ध है।  राजस्थान में छीपे गुजरात से आकर करीब तीन सौ वर्ष पूर्व बसे थे तभी से राजस्थान में छपाई का काम होता आ रहा है। 
चुनड़ी का राजस्थान की महिलाओं के जीवन में बड़ा महत्व होता है।  उत्सवों , मेलों , त्योहारों पर सधवा  सुहागिन स्त्रियाँ चुनड़ी पहनती है।  सधवा स्त्री की मृत्यु पर उसे चुंदड़ी ही ओढाते है।  
पोमचा जच्चा स्त्रियों द्वारा पहना पहना जाता है।  यह पीले रंग का होता है। इसका हाशिया और मध्य भाग लाल रंग का होता है। चितौड़ में जाजम की छपाई होती है तथा गाड़ियाँ -लौहारों के लिए घाघरे-ओढ़नी भी तैयार होते है।  
जयपुर तथा उदयपुर में लाल रंग की ओढ़नियों पर गोंद मिश्रित मिट्टी की छपाई की जाती है। इसके बाद उसके ऊपर छापों द्वारा सोने-चाँदी के तबक की छपाई की जाती है , जिनमें सुन्दर बेल-बूटे बने होते है।  ऐसी छपाई खड्डी की छपाई कहलाती है , यह पक्की होती है।  वर्तमान में खड्डी  की छपाई नहीं की जाती।  आजकल तो सीधे ही कपडे पर तबक छाप दिये जाते है। 
सीकर तथा झुंझुनू क्षेत्र की स्त्रियाँ ओढ़नियो  पर लाल गोटा लगाती है तथा कशीदे का काम करती है।  इनमें ऊँट , मोर , बैल , हाथी , घोड़े आदि बने होते है। मेव स्त्रियां भी कशीदाकारी की ओढ़निया ततः जम्फर पहनती है।  शेखावाटी में विभिन्न रंगो के कपड़ो को विभिन्न डिजाइनों में काट कर सिलाई की जाती है , जिसे पेच वर्क कहते है।  चंदोवे , चादर , बंदनवार भी इसी प्रकार से बनाई जाती है।

गोटे का काम जयपुर तथा खंडेला  में होता है। जरी का काम सूरत  से महाराजा सवाई जयसिंह के समय में जयपुर में लाया गया था।

सांगानेर की छपाई के लिए स्थानीय सरस्वती नदी का पानी विशेष उपयोगी है , जिसमे कपड़ा डुबोने से कपडे में अब आ जाती है। गोबर , तिल्ली का तेल , बकरी की मेंगनी तथा सोडा के मिश्रण से एक घोल बनाया जाता है। इस घोल में कपडे को रात भर डुबोकर रखा जाता है।  बाद में निकाल कर सुखाया जाता है।  धोने के बाद उसे पुनः हरड़ के घोल में डुबोया जाता है। इसके बाद लकड़ी के छापों  से छपाई की जाती है।

छपाई के लिए सीमित रंग काम में लिए जाते है। काला रंग बनाने के लिए जंग तथा गुड़ को सड़ाया जाता है। लाल रंग में गैरु , फिटकरी , तिल्ली का तेल तथा गोंद काम में आता है।  काला रंग रेखाओ के लिए तथा लाल रंग अलंकरण के बीच में खाली स्थान को भरने के लिए काम में लिया जाता है।  पर्दे , चादरें , ओढ़नियाँ , रूमाल , साफे , रजाई के खोल आदि सभी प्रकार की वस्तुएँ इस विधि से ही ही बनाई जाती है।

बगरू में दाब का काम विशेष होता है जो गहरे रंग पर किया जाता है।  अनार के छिलके को पानी में उबाल कर हल्दी मिलाने से हरा रंग तैयार हो जाता है। छान की मिटटी में टाटा मिलाने से दाब या रेजिस्ट बनता है जिसे डिजायन पर लगाया जाता है। उस स्थान पर जमीन का रंग नहीं लगता।

सांगानेर में सिंथेटिक रंगो का प्रयोग किया जाने लगा है।  इसके कारण सांगानेर की छपाई की प्रतिष्ठा गिरने लगी है। बगरू का काम अधिक पसंद किया जाने लगा है।  सांगानेर में लकड़ी के छापो के स्थान पर स्क्रीन प्रिंटिंग किया जाने लगा है , इसके कारण भी उत्कृष्टता में कमी आई है।  बूंटो ( छापो ) के कितने ही नाम होते है - सोतन , गुलाब , हजारा का बूंटा , लटक का बूंटा , डीडे का बूंटा , धनिया , इलायची का बूंटा इत्यादि।  बगरू के महादेव , लक्समीनारायण , सत्यनारायण , हनुमान सहाय आदि छीपों ने इस क्षेत्र में अच्छी प्रसिद्धि पाई है।  

Rajasthan me Hastshilp Short Notes 

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