Rajasthan ke hastshilp part-2 || MINAKARIKALA RAJASTHAN

Rajasthan ke hastshilp राजस्थान के हस्तशिल्प राजस्थान की हस्तशिल्प कला का इतिहास बहुत प्राचीन है।  यहाँ पत्थर  हथियार , मिट्टी  बर्तन , पकाई मिट्टी  खिलोने , हाथीदाँत की वस्तुएँ , मकान की ईंटे , तांबे की कुल्हाड़ियाँ, कपड़ा बुनाई , रंगाई व छपाई , मीनाकारी , चाँदी ,पत्थर ,कुट्टी , लाख का काम , ब्लू पॉटरी , टैराकोटा , गलीचे व दरियाँ आदि बनाई जाती रही है।
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Rajasthan ke hastshilp राजस्थान के हस्तशिल्प part-2

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मीनाकारी 

मीना की कारीगरी या मीनाकारी का शिल्प भारत में विदेशों से आया है तथा राजस्थान के राजाओ ने सबसे पहले उसको प्रोत्साहित किया।  राजस्थान में युद्धों की अस्थिरता के कारण प्राचीन समय में मुद्रा रखने के अलावा स्थाई निर्वाह के लिए सोने को संचित करना अधिक सुरक्षापूर्ण तथा उपयोगी समझा जाता था।  इसके साथ ही आभूषणों को मीनाकारी से अलंकृत किया जाने लगा। 

मीनाकारी की कला जयपुर के महाराजा मानसिंह प्रथम लाहौर से अपने साथ लाये।  लाहौर में सिक्खो द्वारा यह काम किया जाता था। मीनाकारी का काम फाइनिशिया में सर्वप्रथम किया जाता था। तदनन्तर चौंसरो के राजस्व काल में यह शिल्प फारस से लाया गया। 

पंजाब से आकर प्राचीन समय में बसने वाले प्रसिद्ध मीनकारो के नाम - हरिसिंह , अमरसिंह , किशनसिंह , गोभासिंह , श्यामसिंह , घीसासिंह थे। वर्तमान में प्रसिद्ध मीनाकार दुर्गासिंह एवं क़ुदरतसिंह है। क़ुदरतसिंह जी पदमश्री से अलंकृत किया गया हैकाशीनाथ तथा कैलाशचंद्र को राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किये गए है।

जयपुर की मीनाकारी सोना ,चांदी ,तथा ताम्बे पर की जाती है।  मीनाकारी का काम नाथद्वारा में भी किया जाता है। प्रतापगढ़ में कांच पर थेवाकला का काम किया जाता है। महेश सोनी , रामप्रसाद सोनी , रामविलास व जगदीश सोनी को थेवाकला के लिए राज्यस्तरीय तथा राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हो चुके है। 

आभूषणों पर नरज की टिपाई चितेरा करता है।  यह कार्य मीनाकार या सुनार भी करते है। टिपाई की रेखाओ के बीच-बीच में धातु पर औजारों द्वारा गहराई कर ली जाती है।  गहराई के धरातल को छील कर समान कर लेते है। इससे उस स्थान पर लकीरें या सुम्बी पड़ जाती है।  गहराई में रंग भरा जाता है जो लकीरों में जज्व होकर बैठ जाता है तथा पारदर्शक रंग में लकीरों के कारण छाया प्रकाश का प्रभाव भी झलकने लगता है। 

मीनाकारी रंगों को उनकी आग की तपत सहन करने की शक्ति के अनुसार ही क्रम से लगता है।  रंग , कांच तथा पपड़ी दो प्रकार के होते है। कांच के रंग को जो पत्थर के टुकड़ों की आवृति में प्राप्त होता है , खरल में पीसकर पानी के साथ कलम द्वारा वांछित स्थलों में लगाया जाता है। रंग तपाने से पिघल कर तरल हो जाते है।  रंग जब समानता में आ जाते है तो कारीगर उसकी कुरणु से पॉलिश करता है। इस प्रकार रंग पारदर्शक तथा उज्जवल हो जाते है। 

लाल रंग तैयार करने में जयपुर के मीनाकारों को कुशलता प्राप्त है। कागज जैसे पतले पत्थर पर भी मीनाकारी करने में बीकानेर के मीनाकार कुशल होते है। ताम्बे पर केवल सफ़ेद , काला तथा गुलाबी रंग ही काम में लाया जा सकता है। 

मीनाकारी का काम तलवार , छुरियों की मूंठ  तथा आभूषणों में बाजु , बंगड़ी , हार , ताबीज , करधनी , सिगरेट केश आदि पर किया जाता है।  सोने की महंगाई के फलस्वरूप मीनाकारी बहुत कम की जाने लगी है।  पुराने माइन की कारीगरी अधिक कीमती होती है।  

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